Translater

27 اپریل 2018

कानून बदल देने से क्या रेप रुक जाएंगे?


जिस दिन राष्ट्रपति ने बच्चियों से बलात्कार पर फांसी से संबंधित अध्यादेश पर हस्ताक्षर किए, उसी दिन देश के अलग-अलग हिस्सों में चार नाबालिगों के साथ दरिन्दगी की गई। इनमें से दो मासूम बच्चियां थीं। देश में प्रतिदिन 55 बच्चियों के साथ एक रिपोर्ट के अनुसार दुष्कर्म होता है। वर्ष 2016 के आंकड़ों के अनुसार बाल यौन उत्पीड़न के करीब एक लाख मामले अदालत में लंबित हैं। कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन फाउंडेशन की ओर से बाल यौन उत्पीड़न पर जारी ताजा रिपोर्ट में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के हवाले से बताया गया है कि 2013 से 2016 के दौरान तीन वर्षों में बच्चों के खिलाफ अपराध की घटनाओं में 84 प्रतिशत की वृद्धि हुई और इनमें से 34 प्रतिशत यौन उत्पीड़न के मामले हैं। वर्ष 2013 में बच्चों के खिलाफ अपराध की 58,224 वारदातें हुईं जो 2016 में बढ़कर एक लाख छह हजार 958 हो गई। बेशक सरकार ने आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश 2018 के जरिये 12 साल से कम उम्र की बच्चियों से बलात्कार के दोषियों के लिए मौत की सजा का प्रावधान किया है पर क्या इससे रेप रुकेंगे? इस प्रावधान पर दिल्ली हाई कोर्ट ने सोमवार को सवाल उठाए हैं। एक दिन पहले ही लागू हुए इस कानून पर हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि क्या मौत की सजा से रेप को रोका जा सकता है? क्या आपने इस बारे में कोई स्टडी, रिसर्च या वैधानिक आकलन कराया है? क्या आपने सोचा है कि पीड़ित को क्या परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं? कोर्ट ने सवाल किया कि जब रेप और मर्डर में एक समान सजा होगी तो कितने अपराधी पीड़िता को जिन्दा रहने देंगे? क्या किसी पीड़िता से पूछा गया है कि वह क्या चाहती है? रेप लॉ में 2017 में हुए बदलाव को चुनौती देने की याचिका पर सुनवाई के दौरान एक्टिंग चीफ जस्टिस गीता मित्तल की बैंच ने टिप्पणी की कि हाल में (कठुआ और उन्नाव) पर हो-हल्ले के बाद केंद्र ने कानून में संशोधन तो कर लिया, लेकिन उसके लिए न तो कोई रिसर्च की और न कोई स्टडी। सरकार असल कारणों पर गौर नहीं कर रही। इसमें रेप पीड़िता की मदद के लिए कुछ भी नहीं है। बलात्कार के आरोपी उम्रकैद के किशोरों को शिक्षित करने को भी कुछ नहीं किया जा रहा है। निर्भया कांड के बाद सरकार ने बलात्कार संबंधी कानूनी प्रावधानों को बेहद कठोर कर दिया, लेकिन रेप और महिलाओं के प्रति किए जाने वाले अन्य अपराध कम होने के बजाय बढ़ते ही जा रहे हैं। असल समस्या है थाने से ही मामला बिगाड़ दिया जाना और अदालत में मुकदमा खड़ा ही न हो पाना। शहरों में तो रेप की शिकायत दर्ज भी हो जाती है, कस्बों और गांवों में तो उलटे शिकायत दर्ज करने वाले ही गंभीर मुश्किलों में पड़ जाते हैं। फिर मामला जब अदालत में आता है तो वहां किस्मत वालों को ही इंसाफ मिल पाता है। बलात्कार के मामलों में सजा दिए जाने की दर अभी करीब 24 प्रतिशत है जबकि बच्चियों के मामले में तो यह मात्र 20 प्रतिशत ही है। एक महत्वपूर्ण पहलु है कि अदालतों में केसों में बहुत लंबा समय लगता है। बलात्कार के अनेक मामलों में तो उनके परिजनों और परिचित का ही हाथ होता है। अगर हम वाकई ही रेप पर अंकुश लगाना चाहते हैं तो हमें नए परिदृश्य में पुलिस और अदालत को अधिक सक्रिय करना होगा, ट्रायल तेजी से हो। इसका ध्यान रखना होगा कि फास्ट ट्रैक बनाने के साथ-साथ जजों की संख्या भी बढ़ानी होगी। अपीलों पर अंकुश लगाना होगा। या तो यह किया जाए कि सजा के बाद अपील सिर्प सुप्रीम कोर्ट में एक बार हो सकती है और सुप्रीम कोर्ट तीन महीने के अंदर अंतिम फैसला दे जिस पर कोई अपील न हो। इसके अलावा हमें समाज की सोच भी बदलवानी होगी, जिस समाज में जिम्मेदार पदों पर आसीन लोग अपराधों पर जब-तब संवेदनहीन टिप्पणियां करते पाए जाते हैं, वहां यह काम कठिन तो है लेकिन सख्त कानून के साथ-साथ नजरिया बदले तभी सकारात्मक बदलाव संभव है। दुष्कर्म आरोपियों के साथ सरकार को कठोरता बरतनी चाहिए और उनकी अंतिम फैसले तक जमानत नहीं होनी चाहिए। ऐसा करने से न तो वे अपने खिलाफ सबूत नष्ट कर पाएंगे और न ही गवाहों को धमका पाएंगे साथ ही दुष्कर्म के मामले में भय का वातावरण भी बनेगा।

کوئی تبصرے نہیں:

ایک تبصرہ شائع کریں

مارکو روبیو سیدھے جام نگر کیوں گئے؟

امریکی وزیر خارجہ مارکو روگیو حال ہی میں بھارت آئے حالانکہ وہ غیر رسمی دورہ پر آئے تھے،لیکن وہ پروٹوکول کے مطابق راجدھانی نئی دہلی نہیں آ...